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आगम
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[भाग-१५] “राजप्रश्नीय” – उपांग सूत्र-२ (मूलं+वृत्तिः )
---------- मूलं [६७-७४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [१३] उपांगसूत्र- [२] "राजप्रश्नीय" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति:
प्रत सूत्रांक [६७-७४]
दीप अनुक्रम [६७-७४]
तीसे कडागारसालाए सम्वतो समता घणनिचियनिरंतरणिपिछडाई दुवारवयणाई पिहेइ, तीसे कूडागारसालाए बहमजादेसभाए ठिचा तं भेरि दंडएणं महया २ सणं तालेजा, से पएसी! से सहेणं अंतोहितो पहिया निग्गच्छड हंता जिग्गच्छा, अस्थि णं पएसी! तीसे कूडागारसालाए केइ छिड़े वा जावराई वा जीणं से सहे अंतोहितो बहिया णिग्गए, नो तिणढे समझे, एवामेव पएसी! जीवेवि अप्पडिहयगई पुढवि भिच्चा सिलं भेचा पब्वयं मिचा अंतोहितो पहिया णिगच्छद, तंसदहाहि णं तुम पएसी! अण्णो जीवो तं वशतए णं पएसी राया केसिकुमारसमण एवं वदासी-अस्थि णं भंते ! एस पण्णाउवमा इमेण पुण कारणं णो उवागकछह, एवं खलु भंते! अहं अनया कयाइ बाहिरियाए उवट्ठाणसालाए जाव विहरामि, तए णं ममणगरगुत्तिया ससक्वं जाव उवणं ति, तए णं अहं (त) पुरिसं जीवियाओ ववरोवेमि जीवियाओ ववरोवेत्ता अयोकुंभीए पक्विवामि २ ता अउमएणं पिहावेमि जाव पचहपहिं पुरिसेहि रक्खायेमि, तए णं अहं अन्नया कयाई जेणेव सा कभी तेणेव उवागच्छइ २त्तातं अउभि उग्गलच्छामि २त्ता त अउकुंभी किमिकुंभिपिव पासामिणो चेव णं तीसे अउकुंभीए केइ छिट्टेइ वा जावराई वा जताणं ते जीवा पहियाहितो अणुपविद्वा, जति णं तीसे अउकुंभीए होज के छिडेइ वा जाब अणुपविद्वा तेणं अहं सद्दहेजा जहा अनो जीवो तं चेच, जम्हा णं तीसे अउकुंभीए नस्थि कोइ छिडेड वा जाय
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masomamera
केसिकुमार श्रमणं साधं प्रदेशी राजस्य धर्म-चर्चा
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