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________________ आगम (१२) भाग-१४ “औपपातिक" - उपांगसूत्र-१ (मूलं+वृत्ति:) ------- ------------------- मुलं [४३] + गाथा: ||१-२२|| पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११विपाकश्रुत” मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [४३] गाथा: ||१-२२|| | जं संठाणं तु इहं भवं चयं तस्स चरिमसमयंमि । आसी य पएसघणं तं संठाणं तहिं तस्स ॥३॥दीहंदी || वा हस्सं या जं चरिमभवे हवेज संठाणं । तत्तो तिभागहीणं, सिद्धाणोगाहणा भणिया ॥४॥ तिपिण सया तेत्तीसा धणूतिभागो य होइ बोद्धब्बा । एसा खलु सिद्धार्ण, उकोसोगाहणा भणिया ॥५॥चत्तारि ४य रयणीओ रयणित्तिभागणिया य बोद्धव्वा । एसा खलु सिद्धार्थ मज्झिमओगाहणा भणिया ॥६॥ एक्का तय होइ रयणी साहीया अंगुलाई अट्ट भवे । एसा खलु सिहाणं जहण्णओगाहणा भणिया ॥ ७॥ ओगाहभणाएँ सिहा भवत्तिभागेण होइ परिहीणा । संठाणमणित्थंथं जरामरणविप्पमुकाणं ।। ८॥ जत्थ य एगो सिद्धो तत्थ अणंता भवक्खयविमुक्का । अण्णोण्णसमवगाढा पुट्ठा सब्वे य लोगते ॥९॥ फुसइ अणंते & सिद्धे सब्बपएसेहिं णियमसो सिद्धा । तेवि असंखेजगुणा देसपएसेहिं जे पुट्ठा ॥ १०॥ असरीरा जीवघणाट! उवउत्ता दसणे य गाणे य । सागारमणागारं लक्खणमेयं तु सिद्धाणं ॥ ११॥ केवलणाणुवउत्ता जाणंति || ४ सव्वभावगुणभावे । पासंति सचओ खलु केवलदिही अणंताहिं ॥१२॥ णवि अस्थि माणुसाणं तं सोक्खं ४ णविय सचदेवाणं । जं सिद्धाणं सोक्खं अब्वाबाहं उचगयाणं ॥ १३ ॥ जं देवाणं सोक्खं सब्वद्वापिंडियं |अणंतगुणं । ण य पावइ मुत्तिसुहं ताहिं वग्गवग्रहिं ॥ १४॥ सिद्धस्स सुहो रासी सब्बद्वापिंडिओ ||जह हवेजा । सोऽणंतवग्गभइओ सब्वागासे ण माएजा ॥१५॥ जह णाम कोइ मिच्छो नगरगुणे बहुविहे| लिवियाणंतो। न चएइ परिकहेर्ड उवमाएँ तहिं असंतीए॥१६॥ इय सिद्धाणं सोक्खं अणोवम णत्थि तस्स दीप अनुक्रम [५५-७७] | सिद्ध एवं सिद्ध-पद प्राप्ति-विषयक: अधिकार: ~370
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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