SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 134
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम भाग-१४ "विपाकश्रुत" - अंगसूत्र-११ (मूलं+वृत्तिः ) श्रुतस्कंध: [२], ----------------------- अध्ययनं [१] ----------- --------- मूलं [३३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११] विपाकश्रुत" मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: विपाके श्रुत०२ ॥ ९४॥ MAKAL प्रत सूत्रांक [३३] अंतिए मुंडे जाव पब्वइस्सति, से णं तस्थ बहूई वासाई सामण्णं पाउणिहिइ आलोइयपडिकते समाहिर भद्रनकालगते सणंकुमारे कप्पे देवत्ताए उववन्ने, से णं ताओ देवलोयाओ ततो माणुस्सं पवना बंभलोए माणुस्संन्द्याद्यध्य. ततो महासुक्के ततो माणुस्सं आणते देवे ततो माणुस्सं ततो आरणे देवे ततो माणुस्सं सचट्ठसिद्धे, से णं ततो सू० ३४ अणंतरं उध्वहित्ता महाविदेहे वासे जाव अट्ठाई जहा दृढपइन्ने सिजिनहिति, एवं खलु जं! समणेणं जाव संपत्तेणं सुहविवागाणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते (सू०३३)॥ इति पढम अज्झयणं सम्मत्तं ॥१॥ वितियस्स णं उक्खेवो-एवं खलु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं उसभपुरे णगरे थूभकरंडउजाणे धन्नो जक्खो धणावहो राया सरस्सई देवी सुमिणदंसणं कहणं जम्मणं चालत्तणं कलाओ य जुब्बणे पाणिग्गहणं दाओ पासाद० भोगा य जहा सुबाहुयस्स नवरं भद्दनंदी कुमारे सिरिदेवीपामोक्खाणं पंचसया सामीसदामोसरणं सावगधम्म पुब्बभवपुच्छा महाविदेहे वासे पुंडरीकिणी णगरी विजयते कुमारे जुगवाहू तिस्थयरे पडिलाभिए माणुस्साउए निबद्धे इहं उप्पन्ने सेसं जहा सुबाहुयस्स जाव महाविदेहे वासे सिज्झिहिति वुज्झिहिति मुचिहिति परिनिव्वाहिति सव्वदुक्खाणमंतं करेहिति ॥ वितिघं अज्झयणं सम्मत्तं ॥२॥ तबस्स १'महाविदेहे' इह यावत्करणात् 'वासे जाई इमाई कुलाई भवंति-अडाई दित्ताई अपरिभूयाई इत्यादि दृश्यमिति ॥ द्वितीयश्रुतस्कन्धप्रथमाध्ययनस्य विवरणं सुबाहोः राजः ॥ १॥ दीप अनुक्रम [३५-३७] अत्र प्रथमं अध्ययनं परिसमाप्तं अथ द्वितियम् अध्ययनं “भद्रनन्दी" आरब्ध: एवं परिसमाप्त: ~134~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy