SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 118
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम भाग-१४ "विपाकश्रुत" - अंगसूत्र-११ (मूलं+वृत्तिः ) श्रुतस्कंध: [१], ----------------------- अध्ययनं [९] ----------- --------- मूलं [३१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११] विपाकश्रुत" मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक ३१ विपाके यावि होत्था, कल्लोकल्लिं जेणेव सिरी देवी तेणेव उवागच्छति २त्ता सिरीए देवीए पायवडणं करेति सय-18९ देवदचा. श्रुत०१ पागसहस्सपागेहिं तेल्लेहिं अग्भिगावेति अहिमुहाते मंस. तया०चम्मसुहाए रोमसुहाए चोग्विहाए संवा-6 श्यामायाः Pाहणाए संवाहावेति सुरभिणा गंधव(एणं उवद्यावेति तिहिं उदएहिं मज्जावेति तंजहाउसिणोदएणं सी-13I ॥८६॥ ओदएणं गंधोदएणं, विउलं असणं ४ भोयावेति सिरीए देवीए ण्हाताए जाव पायच्छित्साए जिमियभुत्तु-18 मृतिः श्वदसरागयाए तते णं पच्छा पहाति वा भुंजति वा उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरति । त श्वामारणं तते णं तीसे देवदत्ताए देवीए अन्नया कयाइ पुब्वरत्ताचरत्तकालसमयंसि कुडुंबजागरियं जागरमाणीइ इमे-1 सू० ३१ यारूवे अब्भत्थिए ५ समुप्पन्ने-एवं खलु पूसनंदी राया सिरीए देवीए माइभत्ते जाव विहरति तं एएणं | है वक्खेवेणं नो संचाएमि अहं पूसनंदीणा रण्णा सद्धिं उरालाई०Qजमाणीए विहरित्तए तं सेयं खलु मम सि-IF शरीदेवीं अग्गिपओगेण सस्थविस मंतप्पओगेण वा जीवियाओ ववरोवेत्तए २ पूसनंदिरन्ना सद्धिं उरालाई |भोगभोगाई भुंजमाणीए विहरित्तए, एवं संपेहेई २त्ता सिरीए देवीए अंतराणि य३ पडिजागरमाणी] १ 'कलाकलिंति प्रातः प्रातः । २ गंधवट्टएणति गन्धचूर्णेन । ३ 'जिमियभुत्तुत्तरागयाए'त्ति जेमिनायां-कृतभोजनायां तघा मुक्त्त्वोत्तरमागतायां स्वस्थानमिति भावार्थः, उदारान-मनोज्ञान् भोगान् भुखानो विहरति । ४ 'पुन्बरतावरत्तेति पूर्वरात्रापर रात्रकालसमथे, रात्रेः पूर्वभागे पश्चाद्भागे वेत्यर्थः । दीप अनुक्रम ८६ [३३] RELIGunintentiaTATE ... अत्र मूल संपादने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते- यत् सू०३० स्थाने सू० ३१ इति क्रम मुद्रितं, मूल संपादनमें भूलसे सूत्र का क्रम ३० के बजाय ३१ छप गया है| इसिलिए हमे भी सूत्रक्रम- ३१ लिखना पड़ा है। ~118~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy