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________________ ८५ दोसी देवदत्त घरि छइ । चंद्रप्रभ जिन स्वामि । सततालीस जिनवर | पूजतां शिव ठाम । । सोनी रामा घरि छइ । पास जिणंद जुहारउ । अढाइ जिनवर पूजी । भवभय वारउ ॥ ६६ ॥ बिंब रयणमड़ बंदु | तिहां छइ एक ज सार | चड पट्ट अनोपम । दीठइ सवि सुखकार । गोदडनड़ पाटकि । पूजउ ऋषभ दयाल | जिन सरिषा वरण | पेषउ रंग रशाल ॥ ६७ ॥ एकसउ चिउंऊत्तरि । प्रणमंता हुई प्रेम । । विसा थावर घरि छइ । रिषभ करइ ते पेम | चौदह जिण पूज्या | तिहां निज उत्तम भावि । दोसी हीरजी देहरासरि | हईडइ हरषई आवि ॥ ६८॥ पासह जिण निरष्या । तिहां वली ऊलट आणि । उदयकरणनइ घरि । ऋषभ जिन अमृत वाणि । बावन छइ जिनवर | पूजउ हरषि अपार । जिनवर गुण गातां । सुख पामउ बहुवार ।। ६९॥ ॥ कुंकुम तिलक ए ढाल ॥ १९ ॥ पाटकि नाथा सहानई आवउ । शांति जिणेसर भावउ । एकसउ नवागउं देव । हरषि हइड देव ॥ ७० ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034999
Book TitlePatan Chaitya Paripati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKalyanvijay
PublisherHansvijayji Jain Free Library
Publication Year1926
Total Pages134
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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