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________________ सेठ०-तो कुंकुमके वक्त कितने समझते हो ? इन्द्र०-कमसे कम पचास.. सेठ०-आपकी राय मेरी रायसे त्रिगुण है. इन्द्र०-आपके घरका ख्याल करते हुए तो मेरी राय दुरूस्त है. शेठ०-अच्छा आप कोनसा कार्य सम्भालनेकी जिम्मेवारी अदा करेंगे. मुनिम ज्ञानचंदजी (सेठ० सा०से) दुल्हेके जेवर व पोशाकका काम आपकी जवाबदारीमें रखा जाय तो सर्वोत्तम बात होगी. सेठ०-हां बस मेरीभी यही राय है. इन्द्र०-(सेठ० सा० से ) नहीं साहब मैंतो सिर्फ लपके दिवस ही आनेवाला था लेकिन आपने अपने खास मुनिमजीको लियाने मेजे इसीसे इस वक्त आना पड़ा है मतो इन्द्रपुरसे बाला २ ही बम्बई जाउंगा और आपसेभी मुझे मजदूरीमें नहीं डालनेका निवेदन है. - सेठ०-आप स्वप्नमें भी इस ख्यालको मत रखिये, जब तक दुल्हा दुल्हन वापिस घरपर नहीं आजावेंगें मैं आपको हरगिज आने नहीं दंगा. . . इन्द्र०-आप खुद समझते है कि इस वक्त लड़ाईके जमाने में दूकानकों एक दिनके लिये भी नोकरोंके भरोसे छो. ड़ना नहीं चाहता. सेठ०-आपकी व्यवस्था कैसी है । यह सब मुझसे छुपी बात नहीं है आपके जानेकी दलील व्यर्थ है. सामनेकी (ओर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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