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________________ (१४८) वकी०-बेशक डंकेकी चोटपर कहता हूं कि जैनपंचांगके नियमानुसार तिथिमात्रकी ही द्धि नहीं होती है. इन्द्र०-यहां हीरप्रश्नमेंतो स्पष्ट अमावास्यादिकी वृद्धि कहते है. वकी०-खुलासा दे दिया फीर भी आप यही पुछते है ? वहां तो लौकिक पंचांगके अनुसार ही कहा हुआ हैं; न कि जैनपंचांगके अनुसार. यह खुलासा आपको नहीं मिला क्या ? अब आप दूसरी एकमके दिन कल्पवांचनं बता दीजिये, ताकि मैं आपको प्रतिपत के साथ 'प्रथमा और द्वितीया ऐसा विशेषण दिखला देता हूं. इन्द्र०-तो क्या दूसरी एकमके दिन कल्पवांचन नहीं आता है. वकी०-आता हो तो आप दिखा दीजिये ! इन्द्र०-(हँसमुखरायजीकी तरफ देखकर) हँसमुखरायजी! बताईयेन-दुसरी एकमके दिन,कल्पवांचनका प्रारंभ कैसेहोता है? . हँस०-सुनिये जनाब ! दो एकम होवे, और दो दूज होवे अगर दो तीज, या दो चतुर्थी हो तो दूसरी एकमको कल्पवांचन आता है.. इन्द्र०-(वकी० सा० से) लीजिये ! साहब हँसमुखरायजीने दूसरी एकमका कल्पवांचन प्रारंभ दिखा दिया है, अब आप हीरप्रश्नके अंदर एकमके विशेषण दिखाईये! वकी-वाहजी! वाह !! आपकी होशीयारी तो खूब ही है हो! लौकीक पंचांगमें वृद्धितिथि आनेके साथ एक दो दिनके अंतरमें ही तिथिको आपने बढ़ा दी.? एक दो दिनके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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