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________________ (१७) ॥ अष्टम किरण ॥ (स्थान-मोहनलालजी वकीलका उतारा.) आज चर्चाविषयक दूसरा दिन होनेसे सभासद लोगभी ठीक समय पर हाजीर हो चुके है। इन सभासदों के बीचमें पंडितजी-इन्द्रमलजी-वकीलजी वगैरह बैठे हुए है. वकी०-(इन्द्र० से) अब आप छट्ठी गाथाको पढ़ीये. इन्द्र०-(तत्वतरंगिणी लेकर पढते है) जह अन्नसंगि रयणं रयणस्थी गिण्हइ य न कणगाई। न य पुण तंबाईणं हेउ विसेसं विणा मुल्लं ॥ ६ ॥ ___ अर्थ:-जैसे रत्नार्थी, अन्यसंगी रत्नको ग्रहण करता है, लेकिन मुवर्णादिकको नहीं और हेतु विशेष बिना ताम्रादिकका मूल्य कोई देता नहीं है, टीका-"केवलं रत्नं मा पतदित्यभिप्रायवत्पुरुषनियोजितताम्रादिधातुस्तत्रसंगि-संबद्धं, यद्वा पतनभित्यावस्त्रनिबद्धमप्यन्यसंगीत्युच्यते, तथा च यथा रत्नार्थीअपेर्गम्यत्वादन्यसंग्यपि-वस्त्रेण निबद्धमपि ताम्रादिना वा जटितमपि रत्नं गृह्णातीति भावः, यतस्तत्संबन्ध्यापि स्वीयस्वरू. कार्यकरणसमर्थमेव, अन्यथा तथाविधमूल्यमपि न लभतेति, न च तद्वद्रत्नस्थाने वल्लभमपि कांचनं (नादि) कश्चिद्गृहाती. त्यध्याहारेण भिन्मोक्तिः, तेन रत्नकार्यस्याकरणात् , अथ कारणविशेषमंतरेण तत्र त्रयोदशीति व्यपदेश शङ्कापि न विधेयेति Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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