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________________ (१०४) वकी०-यहतो मैं पहलेही कह चुका हूं कि आपके पूज्यश्रीवे ऐसेही खोटे खोटे अर्थ लिखकर व कहकर भोली जनताको भ्रममें डाली है. मैं आपसे पूछता हूं कि " क्षये यह कोनसी विभक्ति है और इसका अर्थ क्या होता है ? .. इन्द्र०-यह सप्तमीका एकवचन है और इसका अर्थ होता है 'क्षय होते हुए या क्षयमें.' वकी०-"पूर्वा" शब्दकी विभक्ति और अर्थ कहिये ? इन्द्र०-"पूर्वा" शब्द, प्रथमाका एकवचन है, और अर्थ होता है 'पहली.' वकी०-"तिथि:" शब्दके विभक्ति आदि कहिये. इन्द्र०-यहभी प्रथमाका एकवचन है, और अर्थ होता है 'पर्वतिथि.' वकी०-"कार्या" शब्दके वि० आदि कहिये ! इन्द्र०-प्रथमाका एकवचन है, और अर्थ होता है 'करना' वकी०-'क्षय होते हुए पहली तिथिमें आराधना करना' इस वाक्यमें रहे हुए 'तिथिमें' का अर्थ सप्तमी विभक्तिका है, या प्रथमाका ? इन्द्र०-अर्थतो सप्तमीका है. प्रथमाका नहीं. वकी०-प्रथमाको सप्तमी दिखलाके आपके गुरुजीने अर्थ लिखदिया और आपने मानभी लिया, क्यों? इन्द्र०-यहतो अध्याहार लिया है. वकी०-आपने अध्याहारका मंत्र ठीक कंठस्थ करलिया है! Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034996
Book TitleParvtithi Prakash Timir Bhaskar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrailokya
PublisherMotichand Dipchand Thania
Publication Year1943
Total Pages248
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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