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।ॐ तत्सत् । श्रीस्वदेश स्तुति. ( जयदेव जयदेव राग.) ॐ सांख्य योगस्थानैक्य, प्रकटित गजवदनं (२) मूषक भक्त्या मोदक(२)
भुक्त्यामुक्तिप्रदम् नमामि निजदेशम् ॥ १ ॥ तुर्यातीत म भयपद, मशेष विघ्नहरं (२) ताप त्रिविधतृष्णाहर, (२)
त्रिशूलसर्पधरम् ॥ नमामि० ॥२॥ समयूरवीणा ग्रन्थवरवं स्फाटिक सत्त्वभरं (२) कला संगीत साहित्य, (२)
जप्त्यातृप्तिकरम् ॥ नमामि० ॥ ३ ॥ जगतोजनकं कमलोद्भूतं, निर्मलं वायुरूपं (२.)। हंसवहं वेदवदं, (२)
_ विकसित चतुर्मुखम् ॥ न० ॥ ४ ॥ धर्मबोधयोरूपं, नंदिगरुडम्बक्तं (२)। सकल संकट संहरणे, (२)
हरहरिपदभक्तम् ॥ न० ॥ ५ ॥ एवं सर्वमभिन्न, मखण्डमेकरसं, (२) शुद्धं बुद्धं सुखदं, ( २)सुरेश
परमेशम् ॥ न० ॥ ६ ॥ निर्भय नित्यनिरञ्जन, निस्वैगुण्यमजं, (२) सञ्चित्सुखनिजरूपं, ( २).
सदैव साम्राज्यम् ॥ न० ॥ ७ ॥ श्रद्धाभक्ति ध्यानसमाधि, गम्यामृततत्त्वं ( २ ) । दपिवति हे जननि,
(२) कृपयाते विदितम् ॥ न० ॥ ८ ॥ तवोपकारानन्त्यं, रिद्धिसिद्धि मयं ( २ )। स्मृत्वानत्वामन्ये, (२)।
प्रभया धन्योऽहम् ॥ न० ॥ ९॥ अतरवमसि महावाक्ये, लक्षणयाज्ञानं (२)। तद्वत्कल्याण कुसुमे, (२)
गृहीतसुघ्राणम् ॥ न० ॥१०॥ नाना छिद्र घटोदर, दीप समविकास (२)। सिंहसदाचार वहजगदादि।
विलासम् ॥ न० ॥ ११॥
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, विचार. २ देखकना स्व. मातुश्री दीवाली. ३ गुलाबराय. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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