SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 102
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मेवाड़ के उत्तर-पश्चिम प्रदेश में ८५ गई । हमें यह बात मालूम होती गई, कि सचमुच ही मेवाड़ में विचरना, स्व-पर के कल्याण के लिये लाभप्रद सिद्ध हो रहा है । वर्षों से पृथक् पडे हुए इन आग्रही तथा महा-अज्ञानी लोगों में, हमारा एक दो दिन का प्रयत्न क्या कार्य कर सकेगा ? हमारी इस भावना की असत्यता हमें स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी । ग्राम ग्राम में होने वाले व्याख्यानों में, लोग उलट उलटकर आने लगे । हृदय में रही हुई मूर्ति पूजा सम्बन्धी शंकाएँ वे निःसङ्कोच भाव से पूछते और कुछ अधिक आग्रही पुरुष तो घण्टों तक रात के बारह बारह बजे तक चर्चाएँ करते थे । मन्दिरों की स्थितियाँ देखी जातीं, इतनी अधिक असातना होने का कारण क्या है, यह देखा जाता, साथ के गृहस्थ ख़ूब परिश्रम पूर्वक मन्दिरों की सफाई करते, पूजा, आँगी–भावना आदि भक्ति करते और ग्राम ग्राम के लोगों में से जिनके हृदय में मूर्तिपूजा की आवश्यकता का विश्वास उत्पन्न होजाता था, वे पूजा तथा दर्शन आदि नियम करते थे। ग्रामों में होनेवाले सार्वजनिक भाषणों में जैनेतरवर्ग भी खूब लाभ लेता था । तेली, तमोली, मोची, चमार, तथा ऐसी ही अन्यान्य जातियों के लोग मी भक्ष्याभक्ष्य के विचार में आरूढ़ होकर अभक्ष्य तथा अपेय वस्तुओं का परित्याग करते थे । जहाँ एक भी घर मूर्तिपूजक जैन का नहीं था, ऐसे स्थानों में भी ग्राम के परिमाण में दोसौ, पाँचसौ, हजार और तीन तीन हजार मनुष्य सभा में एकत्रितं होते थे । जहाँ एक भी दिन रहने की बात में शंका हो, ऐसे स्थानों में दो-दो तीन तीन दिन रहना पड़ता, दिन में दो दो बार व्याख्यान और शेष समय I Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034962
Book TitleMeri Mewad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Jain Granthmala
Publication Year1936
Total Pages124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy