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________________ मंडप युक्त त्रिमंजली चतुर्मुख त्रैलोक्यदीपक नामका मन्दिर बनवाया और उसकी ४ आचार्य, ९ उपाध्याय और ५०० मुनिपरिवार से तपागच्छीय श्रीसोमसुन्दरसूरिजीने सं० १४९६ में प्रतिष्ठाञ्जनशलाका की थी। इसमें लगे हुए शिला-लेख में गोहिलवंशीय ४० पेदियों के नाम हैं। इसके चतुर्दिक ८४ देवकुलिकायें बनी हुई हैं जो जुदे-जुदे समय में बनी हैं, और मन्दिर में भूमिगृह भी हैं। रंगमंडप में एक अधूरी नकशी का स्तम्भ है । कहा जाता है कि चितोड़ के राणाने इस स्तम्भ को बनवाना आरम्भ किया था, पर अधिक खर्च से घबरा कर उन्होंने अधूरा ही छोड़ दिया । जगद्गुरुश्रीविजयहीरसूरिजी महाराज के सदुपदेश से सं० १६४७ में इस मन्दिर का जीर्णोद्धार हुआ था।" राणकपुर इस समय लुप्त अवस्था में भले ही १ राणकपुरे राणकश्रीकुंभकर्णनिवेशिते नलिनीगुल्मविमानानुकारि--त्रिभुवनदीपकनामधारि--विश्वविश्वचेतश्चमत्कारकारिश्रीधरणाभिधव्यवहारिकारित चतुर्मुखविहारे स्वकरकमलदीक्षिताऽऽचार्यचतुष्टयी-परिवृत-तपागणाधिप-श्रीसोमसुन्दरसूरिपाणिप्र. तिष्ठित-श्रीयुगादिदेवप्रमुखानहतः, इति । विजयप्रशस्तिमहाकाव्यवृत्ति, द्वादशमः सर्गः । ९.१२ । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034961
Book TitleMeri Golwad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherDevchandji Pukhrajji Sanghvi
Publication Year1944
Total Pages110
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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