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________________ नाई गई । अन्त में संघपतिने सभी यात्रियों को श्रीफल की प्रभावना दे कर तीर्थोद्धार-कार्य तथा केसरखाता में निजोपार्जित लक्ष्मी का सद्-व्यय किया। इसी प्रकार नाडोल, नाडलाई, सुमेर, देसूरी, घाणेराव, महावीर-मुछाला, सादड़ी मुडारा, बाली, सेसली, खुडाला, सांडेराव आदि के जैनमन्दिरों तथा प्रचलित धर्मसंस्थाओं में उदार-दिल से रकम दे कर लाभ प्राप्त किया। राणकपुर सादड़ी से ६ मील पूर्व-दक्षिण कोण में अर्वली पर्वत के पश्चिम भाग में आया हुआ है। विक्रम की १५ वीं शताब्दि में महाराणा कुम्भा के समय में नांदिया-ग्राम के धन्ना (धरणा) शाहने इसको बसाया था और उसमें ३००० श्वेताम्बरजैनों के घर आबाद थे । यद्यपि इस समय यह नगर खण्डहरों में रह गया है, तथापि मन्दिर की विशा. लता एवं महानता तथा उसकी शिल्पकला जिसकी प्रशंसा करते करते योरोपीय शिल्प-कला विशारद भी थक जाते हैं। जेम्स फरग्युस् साहब इसके अतीत वैभव एवं समृद्धि का दर्शकों के हृदय-पटों पर गहरा प्रभाव डालते हैं और लिखते हैं कि " इस जिनालय के स्तम्भों की रचना इतनी अलौकिक एवं आश्चर्यकारी है कि मुँह से वाह-वाह Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034961
Book TitleMeri Golwad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherDevchandji Pukhrajji Sanghvi
Publication Year1944
Total Pages110
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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