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________________ प्रभु श्रीमद्विजयराजेन्द्रसूरीश्वरेभ्यो नमः । मेरी गोड़वाड़-यात्रा। जिनेश-सिद्धाः शिवभाव भावाः, सुसूरयो देशकसाधुनाथाः। अनाथनाथा मथितोरुदोषा, भवन्तु ते शाश्वतशर्मदा नः ॥ १॥ १ इतिहास में जैनतीर्थों का स्थान___ तीर्थ छोटा हो या बड़ा, परन्तु उसमें किसी अपेक्षा से प्रत्येक भाव का कुछ न कुछ अस्तित्व अवश्य है। समष्टि ऐसी ही छोटी बड़ी अनेक व्यष्टियों का ही योग है। भारतीय शिल्प-कला, बौद्धशिल्पकला, सनातन-शिल्प-कला, यवन-यौन-मुगलशिल्प कलायें उसके व्यष्टिरूप प्रमुख अवयव हैं और प्रत्येक में एक दूसरे से सादृश्यता अधिक अंशों में है और होनी भी चाहिये । परम्परागत प्रभाव को कौन नहीं मानता? । प्रत्येक कला में, व्यवसाय में, धन्धे में तथा संसार के निरन्तर उत्तरोत्तर चलनेवाले, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034961
Book TitleMeri Golwad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherDevchandji Pukhrajji Sanghvi
Publication Year1944
Total Pages110
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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