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________________ चाहिये उस भावनाके सूचक दोहे प्रायः सर्वत्र जैन संप्रदायमें प्रसिद्ध है। जैसे कि जलभरी संपुटपत्रमें, युगलिक नर पूजन्त । ऋषभ चरण अंगूठडो, दायक भवजल अंत ।। १ ।। जानुबले काउसग रह्या, विचर्या देशविदेश । खडे खडे केवल लह्यो, पूजो जानुनरेश ।। २ ।। इत्यादि परंतु बहुत लोग पूजाके समय इन दोहोको बडे ऊंचे आवाजसे गाते हैं, ऐसा होना अनुचित है । पूजा मौनसे ही होनी चाहिये । जैनदर्शनमें श्रद्धाबुद्धिसे जिनबिम्ब तयार करानेवाले के लिये प्रबल पुण्यका होना माना गया है, जैसे कि___“ अंगुष्टमानमपि यः प्रकरोति बिम्बम्, वीरावसानवृषभादिजिनेश्वराणां। स्वर्गे प्रधानविपुलर्द्धिसुखानि मुंक्त्वा, पश्चादनुत्तरगतिं समुपैति धीरः ॥३॥" जो धर्मधार मनुष्य श्रीऋषभदेवसे लेकर श्रीमहावीर स्वामीपर्यंत २४ तीर्थंकरदेवोंकी अंगुष्ठ जितनी भी प्रतिमा बनवाता है वह स्वर्ग: असंख्य सुखभोग कर पीछेसे मोक्षसुखका भागी होता है । भरतचक्रवर्तीने वज्रमयी अपनी अंगूठीमें हीरेकी प्रतिमा रखाई थी। गुजरातके प्रख्यात नरेश भीमदेवके प्रधानमंत्री विमलकुमार भी अपनी मुद्रिका निनप्रतिमा रखकर राजदरबारमें जाया करते थे। मथुरा नगरी में जिस समय जैनधर्मका सर्वतो उत्कर्ष था, उस समय वहांके लोग अपने घरोंके दरवाजों पर भी जिनप्रतिमाकी स्थापना किया करते थे । कहां तक कहा जाय ? देवता लोग जब देवभूमि ( स्वर्ग) में पैदा होते हैं पहिले ही जिनप्रतिमाकी वन्दना पूजना करते हैं । संप्रतिनरेश जो कि चंद्रगुप्त राजाके वंशज अशोकश्रीके पौत्र थे, उन्होंने सवा लक्ष जिनप्रतिमायें बनवाई थीं। जिनमें से आज भी कई एक उस समयकी प्रतिमायें भारतवर्ष के अन्यान्य प्राचीन स्थानामें से निकलती नजर बारी हैं। जैसे अस्टिया Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034952
Book TitleMahavir Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmatilak Granth Society
Publication Year1922
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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