________________
(१८) तुम हो साहिब मैं हूं बन्दा न्यामत देवो न बिसारी । श्री नय विजय विबुध सेवक के तुम हो परम उपकारी ॥
%3D
शीतल जिन मोहे प्यारा शीतत्व जिन मोहे प्यारा ।
भुवन विरोचन पंकज लोचन जिऊ के जिऊ हमारा ॥१॥ शीतलता गुहा और कहत तुम चन्दन कहाँ बिचारा ॥२॥ नामहि तुमरा ताप हरत है बाको घसत घसारा ॥३॥ करिहौं कष्ट जन बहुत हमारे नाम तिहारो श्राधारा ॥ ४ ॥ 'यश' कहे जनम मरण भय भागे तुम नामे भव पारा॥५॥
जगत गुरु तुहीं परमेश्वर ध्याऊं जगत गुरु तुही परमेश्वर ध्याऊ ।
प्रथम तीर्थकर प्रथम पुरुष हैं ताते चित्त न डुलाऊ॥ सकल शास्त्र के तत्व विचारी मति निर्मल ताप लाऊं ॥ विविध स्तवन कर इन्द्र बखाने ते ही को स्तवन बनाऊं ॥
चेत चित्त में चेत घेतन चेत चित में चेत चेतन, चौतरफ चौपट पडी । दुर्मति की दोस्ती ने यह दिखाई है घडी ॥१॥ बाल पन की बहार में तू खेल खेले हर घडी: और जवानी है दीवानी अब तेरे सिर पर चढी ॥२॥
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com