________________
मानश्री. रायपालकों रत्नश्री. तेजपालको तेजश्री और सुरपतिको सुरसुन्दरी. लग्नका प्रसंग बहुतही उत्तम था ओर कन्याओके पित्ताने उन विवहामें नौ नौ क्रोड सोनइयोंका दत्तदायचा दीया था सेठजीके नीनाणव क्रोडकी पहले जमाथी और ३६ क्रोडका दत्त आया इसे १३५००००००० एक अब्ज और पैतीस क्रोड सोनइयोंका पति सेठजी अपने च्यार पुत्रोंके साथ तथा सेठाणीजी च्यार पुत्रोकि ओरतोंके साथ मानो सुरलोकमें देवतोंकि माफीक आनंदमे सुख भोग रहे थे इस सुखके मारे सेठसेठाणीयोंका शरीर आरोग्यके साथ सुन्दरता और लम्बचौडा पसर गया था मांनो मारवाडी सेठोकी माफीक धुंद खुब वढ गइथी सुख एक एसीही चीज हुवा करती है राजतेज न्यातिजाति पंचपंचायति वैणज्य वैपारादिमे धनदत्त सेठजीका बडाही आदर-सत्कार हुवा करता था जीमे सेठजीको नो क्या परन्तु सेठजीके पाडोसी भी उस मुखमें अन्दर मग्न हो गये थे.
पाठकों इन्सानकि सदैव एकही अवस्था नही हुवा करती है सूर्य पूर्वमे उदय होता है वह क्रमशः मध्यानमे होके श्यामका अस्ताचलपर चलाजाता है पूर्णिमाका पूर्णचन्द्र क्रमश: अमावश्यको अवलम्बन कीया करते है सुखके अन्तमे दुःख और दुःखके अन्तमे सुख हुवाही करते है और इस प्रारापर संसारके अन्दर पौद्गलीक जितने सुख और दुःख है वह सब स्वछत कर्मोकाही फल है शास्त्रकारोंने खुब जोर शोरसे पुकार करी है कि हे भव्वों अगर तुमे सुखकी सची प्रमिलाषा है तो सर्व जीवोंके साथ मैत्रिकभाव रखो अपनेसे बने वहांतक कोसीकाही भला करो तांके भविष्यमें सुखी हो पाखीर प्र
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com