SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 46
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २१ ) सौ (१००) वर्ष से ऊपर का स्थापित हो, वह यदि विकलाङ्ग ( उत्तमांगों में खंडित ) भी हो तो पूजने लायक है क्योंकि वह निष्फल नहीं हो सकता । यहाँ पर इतना विशेष है कि वह मूलनायक बिम्ब मुख, नयन, नासिका, ग्रीवा और कटि आदि प्रदेशों में खंडित हो तो पूजने लायक नहीं है, परन्तु आघार, परिकर और लांछन आदि प्रदेशों से खंडित हो तो उसके पूजने में हरकत ( दोष ) नहीं है । सुहनक्कनयणनाही, कडिभंगे मूलनायगं चयह । आहरणवत्थपरिगर - चिंधा ओहभंगि पूजा ॥२॥ -मुख, नयन, नासिका, नाभि और कटि आदि प्रदेशों में खंडित मूलनायक बिम्ब पूजा के योग्य नहीं है, यदि वह उत्तमाङ्ग शोभित और आधार, वस्त्र, परिकर से खंडित हो तो पूजा के योग्य है ( श्राद्धविधिटीका ) इन शास्त्रीय आज्ञाओं से यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि - सौवर्ष के ऊपर का प्रतिष्टित और उत्त Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034926
Book TitleKortaji Tirth ka Itihas Sachitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYatindravijay
PublisherSankalchand Kisnaji
Publication Year1930
Total Pages138
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy