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________________ ७६ ] [ जिनप्रभसूरि अने wwwwwwwwwwwwww __समकालीन इतिहास. जावालिपुर( जालोर )मा रहेला जिनेश्वरसूरिए पोतानो अंतसमय जाणी पोताना पट्ट पर पोताना हाथे वाचनाचार्य प्रबोधमूर्ति गणिने स्थापित कर्या हता, सकळ संघ आगळ बोलाव्यो. पातशाहना चित्तना अनेक चमत्कारो पूग कर्या. मंत्रगर्भित ७०० स्तोत्रो का x x मोटा अवदातवाला ( अतिशयवाला प्रभावक ) पुरुष थई गया. " बी. ज्ञानभंडारनी ७ पत्रवाली बीजी पट्टावलोमां सूचव्युं छे के-" लघुखरतर श्रीजिनप्रभसूरि थया. जेणे महावीरनी मूर्तिने बोलावी, अमावास्यामाथी पुनम करी, अलावदीन (1) पातशाहने शत्रुजयनो संघवी कर्यो, रायणथी दूध वरसाव्यु, संघ साथे वह चळाव्यो, कलावंत शेखनी कुलह( टोपी )ने मुहपत्तिथी मारी आकाशथी माथे आणी, ब्राह्मणनी पाणी भरेली गागर, आकाशमाथी ओघावडे भांगी ठीकरांने हेठल नांख्या. पाणी पिण्डरूप थयु, पातशाहे हाथ धर्यो, ऊपरथी पाणी ऊतयु. शीतज्वरने झोलीमां बांध्यो, लघुखरतरगच्छमां एवा चमत्कारी थया. " ख. ग. नी एक पट्टावली [ साक्षर जिनविजयजी द्वारा संगृहीत अने स्व० बाबू पूरनचंदजी नाहर प्र. पृ. ५४ मां आ प्रभावक जिनप्रभसूरिना घणा अवदातो होवार्नु जणावी अन्य ग्रंथमांथी पद्य उध्धत करी मूक्युं छे, ते पाठान्तर साथे सूचq ढुं. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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