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________________ [ जिनप्रभसूरि अने ६८ ] राजा पर सूरिए रायण झाडथी दूध वरसाव्युं हेतुं. गुजरातमां आगमन वि. सं. १३९० पहेलां थयुं होय तेम जणातुं नथी. ए सर्वनो विचार करतां सोमप्रभसूरिना पट्टधर सोमतिलक सूरि साथे जिनप्रभसूरिनो समागम संभवे छे. १९२१ मां रचेला पंच १ त. शुभशीलगणिए वि. सं. शतीप्रबंध कथाकोश[६. लि. कथा ९] मां मणान्युं वे के" एक वखते सुलतान बोल्या- ' जेवी रीते चमत्कारी तीर्थ कान्हड महावीर छे, तेवी रीते बीजुं पण कोइ छे १' त्यारपछी सूरिए शत्रुंजयतीर्थनुं व्याख्यान कर्यु. त्यारपछी संघ अने जिनप्रभसूरि साथै सुलतान शत्रुंजय गयो, त्यां तीर्थ जोइने ते क्यारे चमत्कार पाम्यो, त्यारे सूरिप कां के - 'आ रायणने जो मोतीओबडे वधाववामां आवे तो क्षीर ( दूध) झरे बे.' त्यारपट्टी तेम करवामां आवतां (रायणने मोतीओथी वधावतां ) रायण दूध झरी. राजाने संघपतिनो आचार कराव्यो. त्यां लखान्युं के- 'जे आ तीर्थनी अवज्ञा करशे, ते पातशाहनी अवज्ञा करे छे. ' श्यारपछी त्यां पाषाणोवडे ७ रेखाओ करावी. स्यारपछी नीचे उतरीने सर्व लोको प्रत्ये क के पोतपोताना देवने लावो. ' त्यारपछी लोको महादेव, विष्णु, ब्रह्मा, जिन विगेरे पोतपोताना देवमे लाव्या. राजा सर्व देवो मंडावीने पूछ के - ' आ वधा देवोम वृद्ध ( बडा ) देव कया छे ? ' ज्यारे लोको न बोल्या त्यारे जिनप्रतिमाने मुख्य स्थानमा बेसारीने हरि, ब्रह्मा विगेरेनी प्रतिमाओोने 1 Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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