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________________ सुलतान महम्मद . ] पट्ट- परम्परा [ १५७ उपर्युक्त जिनदेवसूरिए पोताना पट्ट पर जिनमे सूरिने स्थापित कर्या हता, एम जिनप्रभसूरिगुरु-परंपराना एक गीत द्वारा जणाय छे. ** जिनमेरुसूरि हलि सखे ! घणउ (इ) सोहावणिय रलियावणिय; देसण जिणदेवसूरि मुणिरायहं जाणउँ नितु सुणउ . महि - मंडल धरमु समुधरए जिण - सासणिहिं; अणुदिण प्रभावन करइ गणधरो अवयरिउ वयरसामि. बादिय - मयगल–दलण- सीहो बिमलसील - धरु; छत्तीसगुणधर - गुण - कलिउ चिरु जयउ जिणदेवसूरि गुरु. } ८ ** जिणचंदसूरि जिणपतिसूरि, जिणेसरु गुण-निधानु; तणुक्रमि उपनले सुगुरु, जिणसिंघसूरि जुग-प्रधानु. तासु पाटि - उदयगिरि उदयले, जिणप्रभसूरि भाणु; भविय - कमल - पडिबोहणु, मिच्छत्त - तिमिर हरणु. राउ महंमदसाहि जिनि नियगुणि रंजियउ; मेढमंडल ढिल्लियपुरि जिण-धरमु प्रकटु किए. तसु गच्छ - धुर - धरणु भयलि जिणदेवसूरि सूरिरार; तिणि थापिठ जिणमेरुसूरि नमहु जसु नमइ [नर]राड. गीतु पवीतु जो गायए सुगुरु-परंपरह; समीहि सिन्झहिं, पुहविर्हि तसु नरह ६ सयल Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com ૧
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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