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________________ सुलतान महम्मद ] विशेष परिचय [ १३५ गयो. दंडो अकस्मात् ' तडतड' एवो शब्द करीने बे ककडा थइ सूरिए पूछयूँ के - ' शिष्यो ! आ शब्द केम थयो ? ' शिष्योए जोने कछु के-स्वामी ! तम्हारो आखो दंडो बे ककडा थह गयो. ते पछी आचार्ये विचार कयों के - " म्हारी पाछळ बे गच्छो थशे, तो हुं जाते ज गच्छने म्हारा हाथमां करीश. " 4 आज अवसरमा श्रीमाल संघोए मळीने विचार्य के - आ देशमां कोइ गुरु आवता नथी. चालो गुरु पासे, गुरुने लावीए.' सकल संघ मळीने गुरु पासे गयो. आचार्यने वांदीने सकल संघ विज्ञप्ति करी के - ' स्वामी ! अम्हारा देशमां कोइ पण गुरु आवता नथी, तो अम्हे शुं करीए ? गुरु विना सामग्री ( धर्म - साधना ) न थाय. ' गुरुए पूर्व निमित्त जाणीने श्रीमालवंशमां उत्पन्न थयेला जिनसिंहगणिने पोताना पट्ट पर स्थाप्या. ' जिनसिंहसूरि ' एवं नाम कर्यु अने कहां के - ' आ श्रावको में तमने सोप्या, संघ साथे जाओ.' त्यारपछी गुरुने वांदी जिनसिंहरि श्रावको साथे आव्या. सर्व श्रीमाल संघोए क के - ' आजथी मांडीने आज अम्हारा धर्माचार्य छे. ' छे. एमना पूर्वाचार्यों संबंधी वृत्तांत अन्यत्र प्रकाशित थयेल होवाथी अने केटाको परिचय अम्हे अन्यत्र आपेल होवाथी अहिं प्रस्तुत प्रबंधनोज अनुवाद प्रकट करवामां आवे छे. पहेलां सूचवेला उल्लेखो साथै तुलनात्मक दृष्टि सरखाववाथी आ प्रबंधनी उपयोगिता समजाशे अने पुनरुक्ति जणाशे नहि. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
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