SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 135
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १२४ ] शाह जगसिंह [ जिनप्रभसूरि अने केटलोक काळ वीत्या पछी कोइ पण कारणथी पातशाह तेना पर रुष्ट थया !! तेथी पातशाहे तेने केदखानामां नखाव्या, तेनी रक्षा माटे पोताना एक सेवकनी योजना करी हती. सेवा वखते पण शेठने पातशाहे करेली परतंत्रताथी नही, परंतु पोताना पांच वेळाना धर्म - व्यतिक्रमथी खेद थतो हतो. तेथी ते सेवकने खानगीमा एकैक सोनानो टंको अपावी ए धर्मिष्ठ श्रीमान् पोतानी पुण्य - वेलाओने साधतो हतो. २१ दिवस सुधी २१ टंका अपावी तेणे पोतानां धर्मकार्यों कर्या हतां. त्यार पछी सुलताने प्रसन्न थइ तेने पोतानां शरीर परनां पांच आभूषणो अने पांच पंचरंगी दुकूलो ( उत्तम वस्त्रो )नी पहेरामणी करी हती. त्यार पछी घणां वाद्यो अने घणा लोको साथे वाजते गाजते, याचकोने इच्छित दान आपता शेठ पोताने घरे आव्या हता. पातशाह विगेरेथी डरतो ते रक्षक, एकांत थतां आवीने ते लीला टंका पाछा आपवा लाग्यो. शेठे कछु के-'भद्र ! पोतानो उद्धार करतो हतो. सज्जनो पर उपकार करतो अने दुर्जनोनो तिरस्कार करतो ते जगत्मां शोभतो हतो. " चंचल अधिकारोने प्राप्त करीने जेणे शत्रुओ पर अपकार कर्यो नहि, मित्रो पर उपकार कर्यो नहि, बंधु - वर्गोनो सत्कार कर्यो नहि; तेणे शुं कर्यु ? " Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034907
Book TitleJinprabhsuri ane Sultan Mahommad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra Bhagwan Gandhi
PublisherJinharisagarsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages204
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy