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________________ (९१) इंद्रिय लपट होय खोय निज ज्ञान जमा सब । अज्ञानी जिम करें तिसी विधि हिंसक व्है अब। गमनागमन करतो जीव विराधे मोले । ते सब दोष किये निंदं अब मन वच तोलो । आलोचन विधि थकी दोष लागै जु घनेरे । ते सब दोष विनाश होउ तुमतै जिन मेरे । बार बार इस भांति मोह मद दोष कुटिलता । ईशादिकतें भये निदिये जे मयभीता ॥ तृतीय सामायिक भावकर्म । सब जीवन में मेरे समताभाव जग्यो है। सव जिय मो सम समता राखो भाव जग्यो है। आत रौद्र द्वय ध्यान छांडि करिहूं सामायिक । संयम मो का शुद्ध होय यह भाव वधायक ।। पृथ्वी जल अरु भग्नि वायु चउ काय वनस्पति । पंचहि थावरमाहिं तथा त्रसजीव से जित । बेइंद्रिय तिय चउ पंचेन्द्रिय मांहि जीव संब। तिनसे क्षमा कराऊं मुझ पर चमा को अब । इस अवसर में मेरे सब सम कंचन अरु प्रख महल मसान समान शत्रु अरु मित्राहि समगण । जामन मरण सभान जानि हम 'समता कीनी। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034887
Book TitleJain Vivah Vidhi aur Vir Nirvanotsav Bahi Muhurt Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathulal Jain
PublisherDhannalalji Ratanlal Kala
Publication Year1953
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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