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________________ (६०) अरज करूँ मैं सुनो दोष मेटो दुखदायक ॥ अंजन आदिक चोर महा घनघोर पापमय । तिनके जे अपराध भये ते क्षमा क्षमा किय ।। मेरे जे अब दोष भये ते क्षमहु दयानिधि । यह पडिकोणों कियो श्रादि षटकर्म माहि विधि ॥ द्वितीय प्रत्याख्यान कर्म । इसके आदि या अन्त में आलोचनापाठ वोलकर फिर ___ तीसरे सामायिक कर्म का पाठ करना चाहिए । जो प्रमादवश होय विराधे जीव घनेरे । तिनको जो अपराध मयो मेरे अघढेरे ।। सो सब झूठों होहु जगतपति के परसादै । जा प्रसादतें मिले सर्व सुख दुख न लाथै ।। मैं पापी निर्लज्ज दयाकरि हीन महाशठ । किये पाप अघढेर पापमति होय चित्त दुठ ॥ निंद हूं मैं बारबार निज जियको गरहूं । सब विधि धर्म उपाय पाय फिरि पापहि करहू ।। दुर्लम है नर जन्म तथा श्रावक कुल भारी । सत्संगति सयोग धर्मजिन श्रद्धाधारी ।। जिन पचनामृत धार समावर्ते जिनवानी । तो हू जीव मँघारे धिक् धिक धिक् हम जानी ।। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034887
Book TitleJain Vivah Vidhi aur Vir Nirvanotsav Bahi Muhurt Paddhati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathulal Jain
PublisherDhannalalji Ratanlal Kala
Publication Year1953
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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