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________________ ( ८१ ) विराजमान की गई थी। पहाड़ पर श्री एलाचार्यजी म० की चरणपादुकायें हैं । यह 'तिरुकुरुल' नामक तामिलग्रंथ के रचयिता बताये जाते हैं । अतः यह स्थान भगवान् कुन्दकुन्दस्वामी की तपोभूमि है; क्योंकि उनका अपरनाम एलाचार्य था । उनकी स्मृति में प्रति रविवार को पहाड़ पर यात्रा होती है, जिसमें करीब ५०० आदमी शामिल होते हैं । यहां का प्रबंध पोन्नूर के दि० जैन पंच करते हैं । उन्हें इस मेले में धर्म प्रचार का प्रबंध करना चाहिये । पोन्नूर में एक मंदिर, धर्मशाला और पाठशाला भी है । यहां का जलवायु अच्छा है । वापस तिरिहवनम् आवे । वहां से चित्तम्बर १० मील वायव्यकोण में जावे । श्रीक्षेत्र सितामूर (चित्तम्बूर) चित्तम्बूर प्राचीन जैन स्थान है । अब भी वहां दो दि० जैनमंदिर अति मनोज्ञ शोभनीक हैं; जिनमें से एक १५०० वर्षो का प्राचीन है । श्री संधि महामुनि और पंडित महामुनि ने यहाँ आकर यह मंदिर बनवाया और मठ स्थापित किया था । आज कल वहाँ श्री लक्ष्मीसेन भट्टारक विद्यमान बताये जाते हैं । चैत्र मास में रथोत्सव होता है। बिल्लुकम् प्राम में भी दर्शनीय मंदिर है । यहां से वापस तिण्डिवनम् जावे । और वहां से पुण्डी के दर्शन करना हो तो स्टेशन ( S. I. B. ) जावे । पुण्डी पुण्डी जिला उत्तर अर्काट में अर्नीस्टेशन से क़रीब तीन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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