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________________ ( ७५ ) दिया । वर्तमान मन्दिरों के अहाते में अगणित पाषाण भग्नावशेष पड़े हुये पुरातन जैन गौरव की याद दिलाते हैं। यहाँ से सीधा वेणर व मूडबद्री जाना चाहिये । मार्ग अत्यन्त मनोरम हैं। पहाड़ों के दृश्य, उपत्ययकाओं की हरियाली और झरनों का कलकलनाद मनको मोह लेते हैं। गाँवों में भी जिनमंदिर हैं। रास्ता बड़ा टेड़-मेड़ा है-संसार भ्रमण का मानचित्र ही मानो हो । हलेविड से वेणर लगभग ६० मील दूर है। वेणर वेण र जैनियों का प्राचीन केन्द्र है। यहाँ एक समय अजलिरवंश के जैनी राजाओं का राज्य था। उनमें से वीर निम्मराज ने शाके १५२६ ( सन् १६०४ ई० ) में यहाँ पर बाहुबलिस्वामी की एक ३७ फीट ऊंची खगासन प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई और 'शान्तिनाथस्वामी' का मन्दिर निर्माण कराया था । मूर्ति ग्राम से सटी हुई गुरुपर नदी के किनारे बने हुये प्राकार में खड़ी हुई अपनी अनठी शान्ति बिखेर रही है । प्राकार में घुसते ही दो मन्दिर हैं । इनके पीछे एक बड़ा मन्दिर अलग है, जिसमें हजारों मनोहर प्रतिमायें विराजमान हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ चार मन्दिर और है । यहां से मूडबद्री जावे। श्री मूडविदुरे (मूहबद्री) अतिशय क्षेत्र वेण र मूहबद्री सिर्फ १२ मील है । रास्ते के गांव में भी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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