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________________ ( ६४ ) विध्यगिरि अथवा इन्द्रगिरि और (२) चन्द्रगिरि हैं। गांव के बीच में कल्याणी मील है । इसलिये यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य चित्ताकर्षक है । इन्द्रगिरि को यहां के लोग दोड्ड-बेट्ट (बड़ा पहाड़) कहते हैं, जो मैदान से ४७० फीट ऊँचा है । इस पर चढ़ने के लिये पांच सौ सीड़ियां बनी हैं । इस पर्वत पर चढ़ते ही पहले 'ब्रह्मदेव मन्दिर' पड़ता है। जिसकी अटारी में पार्श्वनाथ स्वामी की एक मूर्ति है । पर्वत की चोटी पर पत्थर की प्राचीर-दीवार का घेरा है, जिसके अन्दर बहुत से प्राचीन जिन मन्दिर हैं। घुसते ही एक छोटा-सा मन्दिर "चौबीस तीर्थकर बसती" नामक मिलता है, जिसमें सन् १६४८ ई० का स्थापा हुआ चौबीस पट्ट विराजमान है । इस मन्दिर से उत्तर पश्चिम में एक कुण्ड है। उसके पास 'चेन्नण बसती' नामक एक दूसरा मन्दिर है, जिसमें चन्द्रनाथ भ० की पूजा होती है । मन्दिर के सामने एक मानस्थम्भ है। लगभग १६७३ ई० में चेन्नएण ने यह मन्दिर बनवाया था। इसके आगे ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ 'ओदेगल बसती' नामक मन्दिर है । यह होयसल-कालका कड़े कंकड़ का बना हुआ मन्दिर है । इस मन्दिरकी छत के मध्य भाग में एक बहुत ही सुन्दर कमल लटका हुआ है। श्री आदिनाथ भगवान् की जिन प्रतिमा दर्शनीय है । श्री शान्तिनाथ और नेमिनाथ की भी प्रतिमायें हैं। इस विन्ध्यगिरि पर्वत पर ही एक छोटे घेरे में श्री बाहु Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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