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________________ ( १२२ ) संस्थायें हैं । यहाँ ५४६ मील लम्बा चौड़ा ताल है। यहाँ से द्रोणगिरि-नैनागिरि जावे। द्रोणगिरि यह सेंदप्पा ग्राम के पास है । सेदप्पा में एक मंदिर और द्रोणगिरि में २४ दिग० जैन मंदिर हैं। मूलनायक श्री आदिनाथ स्वामी की प्रतिमा सं०१५४६ की प्रतिष्ठित है। कुल प्रतिमायें ६० हैं । इस पर्वत से श्री गुरुदत्तादि मुनिवर मोक्ष गये हैं । पर्वत के दोनों ओर चंद्राक्षा और श्यामरी नामक नदियाँ बहती हैं। पर्वत के पास एक गुफा है-वहीं निर्वाणस्थान बताया जाता है। यहाँ से नैनागिरि जावे। नैनागिरि (रेशिंदेगिरि) नैनागिरि गांव से पर्वत दो फरलाँग दूर है । यहाँ शिखरवंद दि० जैन २५ मंदिर पर्वत की शिखिर पर और ६ मंदिर नीचे हैं । एक धर्मशाला है । यहाँ पर भ०पार्श्वनाथका समवशरण आया था और यहाँ से वरदत्तादि मुनिगण मोक्ष पधारे हैं । सबसे पुराना मंदिर १७वीं शताब्दि का बना हुआ है । सं०११२१ में इस क्षेत्र का जीर्णोद्धार स्व० चौधरी श्यामलालजी ने कराया था । सन १८८६ में यहाँ पर एक लाख दि० जैनी एकत्रित हुए थे। यहां से खजराहा जावे । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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