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________________ ॥ ढाल ॥ से सगली रे पैसट प्रतिमा जाणिये । तिण सहुनी रे सगली विगत बखांणिये ॥ मूल नायक रे पन प्रभु ने पास जी । एक चौमुख रे चौबीसी सुविलास जी ॥ ६ ॥ ॥७ टक ॥ सुविलास प्रतिमा पास केरी, बीजी पण तेवीसए । ते माही काउस्सगिया बिहु दिसी बहु सुन्दर दीसए ॥ ७ ॥ वीतरागनी उगणीस प्रतिमा बली ऐ बीजी सुन्दरू। सकल मिली ने जिन प्रतिमा, छियालीस मनोहरू ॥ ८ ॥ ४-कविवरजी ने स्तवन में सब ६५ प्रतिमाएं कही है जैसे कि : २-मूलनायक श्रीपयप्रभ और पाश्वनाथ भगवान की। १-चौमुखजी - समवसरणस्थित चार मुंह वाले । १-चौबीसी - एक ही परकर में २४ तीर्थहरों की मूत्तिएँ । २३-अन्याम्य तीर्थरों की प्रतिमा जिनमें दो काउस्सगिया भी है। १६ --और भी तीर्थकरों की मूत्तिएं सब मिला कर ४६ मूत्तिएँ हुई । १९-तीथंकरों के अलावा अन्य देवी देवता एवं शासन देवताबों की मूनियां भी कविवर ने पटक में लिखा है कि: Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034878
Book TitleJain Shwetambar Prachin Tirth Gangani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVyavasthapak Committee
PublisherVyavasthapak Committee
Publication Year1958
Total Pages24
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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