SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 3
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रस्तावना. परोपकारी महात्मानना लेखोनी महत्वता अपूर्व होय . तेना नोक्ता अवानो आधार तेना ग्राहकना अधिकार उपर रहे डे, एवा अपूर्व ले. खोर्नु रहस्य आदर पूर्वक अभ्यासथोज प्रपट श्रा य बे; अने तेनुं आदर पूर्वक श्रवण पठन अने मनन करवाश्रीज अंते ते फलदायी नीवमे . पवित्र जैन दर्शन जणावे ले के आ जगतमां अनादि कालथोज मिथात्व . जे मानवाने आ पणने प्रत्यक्ष आदि कारणो मोजुद ने, आवा मि थ्यात्वना कारणरुप अज्ञानरुपी अंधकारनो नाश करवा परम नपकारी पूज्यपाद गुरु श्री विजया नंदसूरी (आत्मारामजो)ए आ जैनधर्म विषयोक प्रश्नोत्तर नामनो ग्रंथ रच्यो , आ अने आ सिवायना बोजा आ महात्माए बनावेला ग्रंथो प्रथमश्रीज प्रशंसनीय यता आवेला . आ हित धर्मनो जे नावना तेमना मगज मां जन्म पामेली ते लेख रुपे बाहार आवतांज आखो ऊनीयाना पंझोतो-शानी धर्म गुरुन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy