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________________ ( २ह ) क्या ऐसे अपमानजनक शब्द लिखे जाते ? व्रती के आगे श्रवती को क्यी शोभा का कारण कहा जाता ? वैधव्य दीक्षा से दीक्षित महिलाए तो सौभाग्यवती और सौभाग्यवानों से भी पूज्य हैं। गृहस्थाश्रम में वे वीतरागता की एक किरण हैं । परन्तु उनको इतना मूल्य तो तब मिले जब समाज में विधवा विवाह का प्रचार हो । तभी उनके त्याग का मूल्य है । जो वस्तु ज़बर्दस्ती छिन गई, जिसके ऊपर अधिकार ही नहीं रहा, उसका त्याग ही क्या ? कहा जा सक्ता है कि 'देवी आपत्ति पर कौन विजय प्राप्त कर सक्ता है ? प्लेग, इन्फ्लुएंजा श्रादि से मनुष्य क्षति हो जाती है, वहाँ क्या किसी के हाथ की बात है' ? ऐसी बात करने वालों से हम पूछते हैं कि बीमारी हो जाने पर आप चिकित्सा करते हैं या नहीं ? अगर दैव पर कुछ वश नहीं है तो औषधालय क्यों खुलवाये जाते हैं ? दैव के उदय से कंगाल हो कर भी लोग अर्थोपार्जन की चेष्टा क्यों करते हैं ? दैव के उदय से तो सब कुछ होता है, फिर पुरुषार्थ की कुछ ज़रूरत है या नहीं ? तथा यह बात भी विचारणीय है कि दैव के द्वारा जैसे विधवाएँ बनती हैं; उसी प्रकार विधुर भी बनते हैं । विधुरों के लिये तो दैव का विचार नहीं किया जाता है और विधवाओं के लिये किया जाता है - यह अन्धेर क्यों ? यदि कहा जाय कि विधुरपन की चिकित्सा भी देव के उदय से होती है तो विधवापन की चिकित्साभी देव के उदय से हो जायगी और होने लगी है । मनुष्य को उद्योग करना चाहिये, अगर सफल हो जाय तो ठीक है । अगर सफलता न होगी तो क्या दोष है ? " यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोऽत्र दोषः " Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034860
Book TitleJain Dharm aur Vividh Vivah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSavyasachi
PublisherJain Bal Vidhva Sahayak Sabha
Publication Year1931
Total Pages64
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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