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________________ जैन-धर्म [ ] १ - जिन महान् आत्माओं ने अपने को कर्म व संसार के बन्धन से मुक्त कर लिया है और दूसरों को मुक्ति का सच्चा मार्ग दिखाया है तथा जो वीतराग व सर्वज्ञ हैं उनकी आत्मजागृति के लिए उपासना (पूजा) करना और उनके गुणों का चितवन करना । २ सांसारिक विषय भोगों की चाह से रहित एवं ज्ञान, ध्यान, तप में अनुरक्त मुक्ति के प्रयत्न में लगे हुए सच्चे तपस्वियों का आदर व उनकी सङ्गति करना व उनके जैसे बनने की भावना रखना । ३ – सन्मार्ग पर लेजाने वाले पूर्वोक्त गुणसम्पन्न सच्चे शास्त्रों का स्वाध्याय करना और आत्मज्ञान की वृद्धि करना । ४ – अपने चञ्चल मन और इन्द्रियों पर काबू रखना और इनके दास बनकर विषय भोगों को आदर्श न समझना तथा प्रत्येक प्राणी की रक्षा का हर एक कार्य करते समय ध्यान रखना और अपने द्वारा किसी को कष्ट न पहुँचने देने की सदैव भावना रखना व प्रयत्न करना । ५- प्रति दिन प्रातः सायं एकांत में बैठ कर आत्मचिंतन करना और परमात्मा का ध्यान करते हुए वैसे बनने के लिए भावना बनाना एवं अपने अच्छे बुरे कार्यों की समालोचना करना । ६ - दूसरों का जिस प्रकार भी हो, भला करना, अपने स्वार्थ का त्याग कर भोजन, वस्त्र, औषधि, आदि चीजें बिना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034859
Book TitleJain Dharm
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Dongariya Jain
PublisherNathuram Dongariya Jain
Publication Year1940
Total Pages122
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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