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अथ ग्रन्थ बड़ा संतोष बोध ।
धर्मदास वचन। धर्मदास पूछे चित लाई, तत्वभेद कहिये समुझाई । कौन तुरे कै जोजन दोरा, भाखो साहेब हम है भोरा । तत्वनको अस्थान चिन्हावो, भिन्नभिन्न करि मोहे बतायो । विनय करौं कीजे प्रभु दाया, धर्मदास गह दोनों पाया।
सतगुरु वचन । धर्मनि सुनो तत्त्व ब्यौहारा, निस वासर का कहौं विचारा । लाल तुरे जोजन परवाना, मुसकी जोजन डेढ सिधाना । हरै तुरे जोजन दोय जाई, पीरा जोजन तीन चलाई । हंसा जोजन चारहि धाई, फिरके डंड तबे ले आई। मूल कँवल है तेज ठिकाना, षट्दल तत्त्व अकास बखाना । कवल अष्टदल है तत्त्व बाई, द्वादश दलमौं पृथ्वी रहाई । षोडस दल जल तत्व बखाना, धर्मदास गहि राखु ठिकाना । यह विधि पांचों आवे जाई, अपनि अपनि मजल के मांई । पांच तुरे रथ एक समारा, ता भीतर मन जीव पसारा । जीव पडा है मनके हाथा, नाच नचावें राबै साथा । साखी-अष्ट पंखुरी को कॅबल हैं, तेहि भीतर जीवका बास ।
तापर मनको आसना, नप शिष तिनके पास ॥
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