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ज्ञान स्वरोदय।
ताही को मन आन, रात दिन सुरत लगावौ । आपू आप हि बीच, और न सीस नमावौ ।। सो हि कबीर कथि कहत हैं, अगम निगम की साख । येहि बचन ब्रह्मज्ञानका, धर्मदास चित राख ॥११॥
ओहं सों काया भई, सोहं सों मन होय । निहअक्षर स्वासा भई, धर्मदास भल जोय ।। धर्मदास भल जोय, बैंचि मन तहँवाँ राख्यो । क्षर अक्षर है एक, मनकी दुविधा नाख्यौ । जब दसैं एक हि एक, भेप है सबहि तुम्हारो । डार पात फल फूल, मूल सो सब हि निहारो ॥२॥ श्वासा सों सोहंग भयो, सोहं सों ॐकार ।
ओहं सों र्रा भयो, धर्मनि करहु बिचार ।। धर्मनि करहु विचार, उलटि घर अपने आवो । घट घट ब्रह्म अनूप, समिटि कर तहाँ समावो । जब मन मनी मिले मन केर, दमकी खबर करे बेर बेर । कहैं कबीर धर्मदास सों, उलटे मेर सुमेर ॥३॥ चार वेद को भेद है, गीता को है जीव । धर्मदास लख आपमें, तो तेरो पीव ॥४॥ सब जोगन को जोग है, सब ज्ञानन को ज्ञान । सर्व सिद्धको सिद्ध है, तत्त्व स्वरन को ध्यान ॥५॥ ब्रह्म ज्ञान को जाप है, अजपा सोहं साध । परमहंस कोइ जानि है, ताको मता अगाध ॥६॥
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