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________________ [९०] भाव पुजा तस सारे ॥ भविजन प्रवचन परखीरे ॥८॥ ३० ॥ भाव पुजा ते कही मुनिवरने ॥ श्रावकने द्रव्यभावरे ॥ वृद्धिवादे बोलीजी पुजा भवजल तरवा नावरे ॥ ९॥ध०॥ श्री जिन अंगे मजन करतां ॥सत उपवासतुं पुन्यरे द्रव्य सुगंध विलेपन करतां ॥ सहस लाभ होय धन्यरे ॥१०॥ ध० ॥ सुरभि कुसम मालाये पूजे । लाभ लक्ष उपवासरे ॥ नाटक गीत करेजिन आगे ॥ लहे अनंत मुख वासरे ॥११॥ ३०॥ श्री जिन भक्ति तणां फल : एहवां ॥ जांणी लाभ धरीजेरे ॥ वलि विषेके शेजें. जय सेवा ।। लाभ पारनलहीजेरे ।। १२ ॥ ध० ॥ . भाग एक शेव॒जय केरो ॥ तीर्थ श्री गिरिनाररे ।। नेमिकल्याणिक त्रण हुआ जिहां ।। महिमा न लहुं पाररे १३॥ ५० ॥ प्रगट श्री प्रभास पुराणे ॥ जो जो मूकी मानरे ॥ रेवतनेमि तणो जे महिमा । उमयाने इशानरे ॥१४॥ ध० ॥ वलि बंधन सामर्य तणे खपे ॥ तपजिहां तप्यो मुरारीरे ॥ अधिकार प्रगट जिहां दिसे ॥ वामनने अवतारेरे १५॥१०॥ यतः॥प्रभास पुरांणना श्लोक ॥ पद्मासन समासीन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Unwanay. Suratagyanbhandar.com
SR No.034829
Book TitleGirnar Galp
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherHansvijayji Free Jain Library
Publication Year1921
Total Pages140
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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