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________________ (३) केणवि बहुवेयणत्तो केण व कम्मेण वेयणविमुक्को । पंचिंदिआवि होइ केणवि एगिदिओ होइ ॥ १० ॥ संसारोवि कह थिरो केवि कम्मेण होई संखित्तो। कह संसारं तरिउं सिद्धिपुरं पावइ पुरिसो ॥ ११ ॥ भावार्थ:-हे भगवन् ! (सुच्चिय नरयं ) १ सएव अर्थात् वही जीव नरकमें कैसे जावे ? फिर २ वही जीव स्वर्गमें कैसे जावे ? पुनः ३ वही जीव तिर्यंच कैसे होवे ? और ४ वही जीव मनुष्य जन्म भी कैसे पा सकता है ? (२) भगवन् ! ५ वही जीव पुरुष कैसे होता है ? ६ वही जीव बी कैसे होता है ? ७ वही जीव नपुंसक कैसे होता है ?। पुनः ८ वही जीव अल्पायुषी कैसे होवे ? वही जीव दीर्घ आयुष्यवाला कैसे होवे ? १० वही जीव भोग रहित कैसे होवे ? और ११ वही जीव भोग भोगने वाला कैसे होवे ? (३) हे भगवन् ! १३ किस कर्मके योगसे जीव सौभाग्यवंत होसकता है ? १३ किस कर्मके उदयसे जीव दुर्भागी होता है ? १४ किस कर्मके योगसे जीव (मेधायुक्त) बुद्धिमान होता है ? १५ और किस कर्मके योगसे जीव हीनबुद्धिवाला होता है ? (४) १६ किस कर्मके योगसे पुरुष पंडित होता है ? १७ किस कर्मके योगसे मूर्ख होता है ? १८ किस कर्मके योगसे धीर-साहसिक होता है ? १९ किस कर्मके योगसे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034825
Book TitleGautam Pruccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain Library
PublisherLakshmichandra Jain Library
Publication Year1921
Total Pages160
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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