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________________ (१३२) प्रविष्ट होता हुआ स्वप्नमें देखा । बुरा स्वप्न जान कर भरतारको यह बात न कही । अनुक्रमसे काला, चीपडा, दंताला, तुच्छ कर्णवाला, जिसकी छाती व पेट स्थूल, बाहु छोटी, जांघ लंबी, शरीरमें रोम अधिक, दुर्भागी, दुःस्वर ऐसे पुत्रका प्रसव हुआ । लोगोंने उसका रूप देख कर असुंदर ऐसा नाम दिया । वह पुत्र मूर्ख धर्महीन हुआ । 'पापमें कूडा और कोई न कहे रूडा' ऐसा दुर्भागी हुआ। जिससे उसको कोइ कन्या देता नहीं । द्रव्य देने लगा तिसपर भी कोइ कन्या देनेको कबूल न हुआ। देख कर पापमें कूडा आराया देता नहीं । तब पिताने कहा कि हे-वत्स ! तूने पूर्वभवमें पुण्य नहीं किया है, जिससे तू ऐसा कुरूप हुआ है, और वांछित नहीं पाता है; अतः अब तू धर्मकरणी कर । ऐसी शिक्षा दी, तथापि धर्म करनेकी उसकी इच्छा नहीं हुई। एकदा उस नगरमें चार ज्ञानके धारक ऐसे सुव्रत नामक आचार्य आ कर समोसरे। उनके पास देवसिंहने पुत्र सहित जा कर वंदना की । गुरुने धर्मोपदेश दिया, यह सुनकर जिस प्रकार मेघगर्जनासे मयूर हर्षित होता है उसी प्रकार सब हर्षित हुए । देशनानंतर सेठने पूछा कि-हे भगवन् । मेरे दो पुत्र हैं, उनमें एक बडा पुत्र गुणवंत सौभागी और पुण्यशाली हुआ और दूसरा लघुपुत्र दुष्ट दुर्भागी पापरूचि बूरा हुआ । अतः उन्होंने कैसे २ पुण्य पाप किये होंगे ? सो कहिये । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034825
Book TitleGautam Pruccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain Library
PublisherLakshmichandra Jain Library
Publication Year1921
Total Pages160
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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