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________________ ( ४ ) " स्यादस्ति कार्यकरणेन समस्त वस्तु | स्यान्नास्ति तच्च विलयात् परतश्च बाधात् ॥ २५ ॥ यहां से २८ तक - जैनदर्शन कार्य करनेसे ही सब वस्तु को सत् मानता है, और वस्तु नाश होने से यातो इतरज्ञान से बाघ होनेसे वस्तुओं को असत् मानता है इत्यादि । अब इस पूर्वपक्ष के खण्डन में महाशयजी अपनी न्यायप्रवीणता दिखलाते हैं की" हा ! हन्त ! संतमससंततवासघूक ! नानाविकल्पमय दुर्मतजञ्जक ! | प्रामाणिको न हि वदन् विरमेद् विकल्पेsप्रामाणिकोक्तिरपराध्यति वादकाले || ३६ || वस्तुस्थितिप्रमितिरेव हि मानकृत्यं न त्वस्ति वस्तु युगपत् सदसद्दिरूपम् । वस्तुन्यस द्विविधरूपमतिभ्रमः स्यात् तां दोष एव जनयेद् न कदापि मानम् ॥ ३७ ॥ अन्योऽन्यबाधकम सच्चमथापि सत्त्व मेकत्र वक्षि युगपद् यदि संशयः सः । यत्सर्वसंशयनिवर्ति तदेव शास्त्रं संशाययेत्तदपि चेत् शरणं किमन्यत् १ ॥ ३८ ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034824
Book TitleMahamohapadhyay Gangadharji ke Jain Darshan ke Vishay me Asatya Aakshepo ke Uttar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSacchidanand Bhikshu
PublisherHarakchand Bhurabhai
Publication Year1913
Total Pages82
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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