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________________ PREM શ્રી ધર્મ પ્રવર્તન સાર, Woren GROGRG GARGrnamaraGGG PERAGARAGRAMINERASSAGresires ए मनोरथ ज्ञान शीतळनो, पूरण करजो स्वामी ॥ हुं तमने है उपगारी जाणी, नित्य प्रणमुं शीर नामी॥ शीतळ ॥५॥ ॥ संपूर्ण ॥ ॥ स्तवन ॥ १: मुं॥ धन्य धन्य संप्रति साचो राजा ॥ ए देशी ॥ श्रेयांस जिन सेवा कीजे, त्यां अनुन्नव रस पीजे रे ॥ साधन ए सम अवर न दुजो, आत्म कार्य त्यां सिजेरे ॥ श्रेयांस जिन सेवा कीजे ॥ ए आंकणी ॥ गाथा ॥१॥ श्रीश्रेयांस जिन अंश स्वरूपी, समकित सरोवर तीरे रे॥ ज्ञान जळ मान सरोवर नरीओ, खेले खेल चित्त स्थिरेरे॥ श्रे॥२॥ आत्म गुण चारोतीहां चावे, वीर्य अनंतु पावे रे ॥ तिम तिम क्रीमा अधिकी थावे, दायक नव लब्धि त्यां श्रावेरे ॥ श्रे० ॥ ३॥ एही सिद्ध एही परमेसर, निरंजन निराकार रे ॥ ज्ञान शीतळ अनुन्नव अंश सेवे, ते उतरे नव पार रे ॥ श्रे० ॥ ४ ॥ संपूर्ण ॥ ॥सवन ॥ १२ मुं॥ मांजरीश्रा मुनिवर धन्य धन्य तुम अवतार ॥ ए देशी॥ वासपूज्य जीन वारमाजी, मुक्ति पुरीमां वास ॥ स्वरुप रमण उपयोगगुंजी, लहे पूज्य शिवरूप तास ॥ रंगीला प्रीतम तुजसुं अविहम नेह ॥ए आंकणी ॥गाथा॥ ॥ १॥ अनादि वास मिथ्यात्वमांजी, तीहां जमरूपी जीव ॥ 5 काळ लब्ध आवे जदाजी, पामें समकित नजी शीव ॥ है = ॥रंगीला० ॥२॥ तीहां घट अंतर वासीयाजी, अनुन्नव ६ Ranwroorgawraane mal GRGrenorror Gre Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034802
Book TitleDharm Pravarttan Sara Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSurchandbhai Swarupchand Shah
PublisherRatanchand Laghaji Shah
Publication Year1910
Total Pages344
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size15 MB
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