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________________ ४८ पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता । सा भर्तृलोकमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते । १६५ ॥ अनेन नारी वृत्तेन मनोवाग्देहसंयता । इहाय्यां कीर्तिमाप्नोति पतिलोकं परत्र च " ॥ १६६ ॥ अर्थ - विवाहित पति जीता हो या हो मरगया हो; परन्तु पतिलोककी चाहना करनेवाली कुलवान स्त्री वह कार्य नहीं करती है, जो उसके पतिको अप्रिय होता हैं । अर्थात् - पुत्रकी प्राप्तिके लिये भी वह व्यभिचार सेवन नहीं करती है । १५६ साध्वी- अच्छे आचरणवाली - स्त्रीको चाहिए कि वह कामको और अपने शरीरको पुष्प, मूल और फलके आहार से नाशकर दे परन्तु परपुरुषका नाम भी न ले । १५७ एकपतिवाली स्त्रियों के उत्तमधर्मकी इच्छा करनेवाली स्त्री मरणपर्यंत क्षमाशील और पूर्णरूपले ब्रह्मचारिणी बनकर रहती है । १५८ पतिके परलोक जानेके पश्चात् जो स्त्री ब्रह्मचर्यमें लीन रहती है, वह पुत्रके न होने पर भी स्वर्गमें जाती है । जैसे सनक और वालखिली वगैरे कुमार गये हैं । पुत्र के लोभसे जो स्त्री अपने पतिको छोड़ अन्य पुरुषके पास जाती है, वह इस लोकमें निंदाकी पात्र बनती है, और पतिलोकसे भी भ्रष्ट होती है । १६१ अन्य पुरुषसे उत्पन्न कीगई सन्तान नीतिविरुद्ध होनेसे Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034783
Book TitleBramhacharya Digdarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaydharmsuri, Lilavat
PublisherYashovijay Jain Granthmala
Publication Year1925
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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