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________________ बाल्यावस्थामें पड़नेवाली बुरी आदतें । ___ संसारी जीवोंमें विषय-सेवन की प्रवृत्ति अनादि कालसे चली आरही है । यानी कुदरती नियमके अनुसार मनुष्की प्रवृत्ति उसकी ओर झुकी हुई रहती ही है। इसमें भी वासनासे संबंधरखनेवाली जो आवाजें कानमें पड़ती हैं वे और विषयसे संबंध रखनेवाली जो चेष्टाएँ दृष्टिमें आती हैं वे तो कोमल बालकोंके मनमें विषयका विष डालती हैं; उनके माता-पिता इस बातकी ओर बहुत कम ध्यान देते हैं । ध्यान न देनेके कारण परिणाम यह होता है, कि लड़कोंको स्वच्छंदता प्राप्त हो जाती है और वे अनेक बुरी आदतों के ग्रास बन जाते हैं। ऐसी बुरी आदते लड़कों और युवकों की ही नही बल्के लड़कियों और स्त्रियोंकी भी पड़ जाती हैं। इनमें से बड़ीसे बड़ी और ज्यादासे ज्यादा खराब करनेवाली बुरी आदत " हाथोंसे वीर्यका नाश करना " है। इसको कई वैद्य ' हथरस' के नाम से पुकारते हैं। मनुष्य ऐसी बुरी आदतके वश होकर अपनी जवानीको तकदीली जवानी बना लेते हैं । इतनी खराबीसे ही इसकी इति श्री नहीं होती; वे अपने जीवनको भी इसके द्वारा बहुत ही जल्दी मृत्युके मुखमें खींच लेजाते हैं । कॉलेन और हाईस्कूलके विद्यार्थी युवकों की ऐसी दशा होनेका यही मुख्य कारण है । शरीर और मनकी शोचनीय दशा बनानेवाली भी यही बुरी आदत है । इस दुराचरणके कारण मनुष्यकी जितनी खराबी होती है। उसका Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034783
Book TitleBramhacharya Digdarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaydharmsuri, Lilavat
PublisherYashovijay Jain Granthmala
Publication Year1925
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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