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________________ पर अंग्रेजों की बस्ती बसाने के सम्बन्ध में ढढापी ने विस्तीर्ण भाषण किया। परिणामतः श्वेताम्बर दिगम्बर समाज के कंधे मिलाकर परिभम करने से उस सम्बन्ध में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। सभापति महोदय ने जैन समाच और जैनधर्म की ऐतिहासिक पुस्तक तैयार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। खेद है कि ऐसी पुस्तक अब तक भी तैयार न हो पाई । इसका मूल कारण समाज में विद्या की न्यूनता और उपेक्षा है । जो अब भी वैसी ही चली जाती है। समान में शिक्षा प्रचार, बैन बैङ्क की स्थापना धर्मकोष की अव्यवस्था, सहकारी व्यापारिक कार्यालयों की स्थापना का मार्ग भी सभापति महोदय के भाषण में दिखलाया गया था । श्वेताम्बर जैन कांफ्रेंस के पिता रूप, सभापति महोदय के भाषण का अंग्रेजी अनुवाद जैन गजट माच १९०८ में ८ पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है। और प्रत्येक श्रावक के लिये पठन और मनन करने योग्य है। अधिवेशन के प्रारम्भ में श्री मूलचन्द कृष्णदास कापडिया ने गुजराती भाषा में लिखा हुआ अभिनन्दन पत्र पढ़कर मेट किया था, उपस्थिति करीब २०० थी। इस अधिवेशन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रस्ताव निश्चित हुए। न०४-चैन समाज का ध्यान कलकत्ता अधिवेशन के प्रस्ताव नं० १ पर दिलाते हुए महिला नार्मल स्कूल और कन्या पाठशालाओं को स्थापना, स्वकीय सम्बन्धी स्त्रियों का शिक्षण, शिक्षित महिलाओं को पारितोषिक, प्रादर्श पुस्तक प्रकाशन आदि कार्यों की आवश्यकता बतलाई गई मगनबाईजी और लखनऊ निवासी पारवतीबाईजी को ब्रो शिक्षा प्रचार में अग्रसर होने के लिये धन्यवाददिया गया; इस प्रस्ताव को पण्डित अर्जुन लाल सेठी ने उपस्थित किया; उसका समर्थन श्रीयुत भग्गूभाई फ वेहचन्द कारभारी सम्पादक "जैन" ने किया और विशेष समर्थन में भी ललबूभाई करमचन्द्र दलाल, और यति माहराज नेमी कुशलबी ने बोरदार भाषण दिये। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034772
Book TitleBharat Jain Mahamandal ka Sankshipta Itihas 1899 to 1946
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitprasad
PublisherBharat Jain Mahamandal Karyalay
Publication Year1947
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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