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________________ अहो अहो समता थी कैसी सहे कष्ट मरणान्त अनेक । अगर और कोई होता तो, निश्चय खो देता सुविवेक ।। पर जिनको था ज्ञान गर्भ से देहादिक अरु आतम का । विचलित वे कैसे होवें जो पद धरते परमातम का ॥ नाम-मात्र के वीर नहीं थे विजय किये थे विकृत भाव । कर्म शत्रु जीते, जिनका था इन्द्रादिक पर अमिट प्रभाव ।। जीवोंके कल्याण-हेतु ही चैत्र शुक्ल तेरस शुभ दिन । जन्म हुआ था सब को सुखकर आज वही दिन पावन धन ।। यज्ञों में पशु हिंसा होती थी मानों उनमें नहीं प्राण । किया निवारण बता वीर ने जीव सभी हैं एक समान । माना था बस क्रिया काण्ड में लोगों ने सर्वरच तभी । कहा वीर ने ज्ञान विना की क्रिया अफल हैं सदा सभी । उच्च नीचता तब लोगों में जाति पर ही निर्भर थी। स्त्री जाति की दशा देश में पूर्ण रूप से बदतर थी । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034732
Book TitleAntim Tirthankar Ahimsa Pravartak Sargnav Bhagwan Mahavir Sankshipta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGulabchand Vaidmutha
PublisherGulabchand Vaidmutha
Publication Year
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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