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________________ ३. ऋग्वेद-ॐ त्रैलोक्य प्रतिष्ठतानां चतुर्विंशति तर्थिकराणां । ऋषभादि वर्द्धमानान्तानां सिद्धानां शरणं प्रपद्ये ।।' अर्थ-तीन लोक में प्रतिष्ठित श्री ऋषभदेव से लेकर श्री बर्द्धमान स्वामी तक चौवीस तीर्थकर हैं उन सिद्धों की शरण प्राप्त होता हूं। ४. ऋग्वेद-'ॐ नग्नं सुधीरं दिग् वाससं ब्रह्मगर्भ सनातनं उपमि वोरं पुरुषमहेतादित्य वर्ण तमसः पुरस्तात् स्वाहा'। अर्थ-नग्न धीर वीर दिगम्बर ब्रह्मस्वरूप सनातन अहेत आदित्य वर्ण पुरुष की शरण प्राप्त होता हूं। ऋग्वेद-अ० २ सू ३३ वर्ग १०- अहन विमर्षि सायकांति धन्वाहभिष्कं यजतं विश्वरूपम् अर्हन्नदं दयसे विश्वमम्यं न वा अओ जी-यो रुद्रत्वहस्ति । भावार्थ--हे अर्हन वस्तु स्वरुप धर्म रूपी वाणी को, उपदेश रूपी धनुषको तथा आत्मचतुष्ठय रूप [अनन्त ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य, अनंत सुख ] आभूषणों को धारण किये हो। हे अर्जुन आप संसार के सब प्राणियों पर दया करते हो और कामादि को जलाने वाले हो, श्रापके समान कोई रुद्र नहीं है। ऋग्वेद-मंडल १ सू-६४ मंडल ५ सू -५२-५ में श्री ऋषभ देव की इस प्रकार स्तुति की गई है:Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034732
Book TitleAntim Tirthankar Ahimsa Pravartak Sargnav Bhagwan Mahavir Sankshipta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGulabchand Vaidmutha
PublisherGulabchand Vaidmutha
Publication Year
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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