SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 9
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अधिकमास निर्णय. मुनिहुं. ताकात होते हुवेभी जवाब नहीं देना, एकतरहकी कमजोरी अपनेसीर आतीहै, इसलियेभी जवाबदेना बहेतर समजाया, अगरकोइ जैन मुनि एसाखयालकरेकि जवाब देनेसे आपसमें अनबनाव होगा, तो यह खयाल महेज गलतहै, इन्साफसे अछेशब्दोमे जबाब देना किसीपर अंगतटीका नही करना, इससे कभी अनबनाव नही होसकता, अपनेपर कोइ आक्षेपकरे और उसका जवाब नहीं देना बडी भूल है. अपने गछके श्रावकोको इसबातका शकपैदा होगाकि सायत! अपना मानना गलत होगा, इसलिये जैनशास्त्रके पढेहुवे जैनमुनिकों लाजिमहै. जवाबदेना, दुसरे गछवाले बजरीये लेखके तपगछके मंतव्यपर आक्षेपकरे और उसका माकुल जवाव न दियाजाय यह मुनासिब नही. ८-आजकल अधिक महिनेकी चालुचर्चा में जैनसमाजमेसे जो जो महाशय लेख लिखतेहै; उनमें बहुत करके एक दुसरोपर अंगतटीका होतीहै, ऐसे लेख बाचनेवालेभी पसंद नहीं करते, इसलिये जिसबातपर चर्चा चलीहो उसीपर कायम रहकर अछेशब्दोंमें लेख लिखना चाहिये. मेने जो पहले पर्युषण निर्णय किताब बनाइथी, उसको जिनोने पढीहोगी, उनको मालुम होगाकि उसमे भाषा कैसी रखीगइहै ? और इस अधिक मास निर्णय किताबमेंभी देखलो! इबारत कैसी लिखीहै, में अपशब्द लिखना पसंद नहीं करता. प्रतिपक्षीके लेखका माकुलजवाब देना पसंद करताहुँ.. ९-मेरी बनाइ हुइ किताब पर्युषणपर्व-निर्णय जबगत भाद्रपद महिनेमे छापकर जाहिर हुइथी. खरतर गछके मुनि श्रीयुत मणिसागरजीकोंभी भेजी गइथी, उसपर उनोने कुछ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034727
Book TitleAdhik Mas Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShantivijay
PublisherShivdanji Premaji Gotiwale
Publication Year1917
Total Pages38
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy