SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 6
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अधिक-मास-दर्पण. पाठसे शास्त्रार्थ करना, जिस पक्षवालोंकी जित होवे वोअपना खर्चा प्रतिपक्षवालोंसे लेवे सभा करना-तो-ऐसी करना, नही तो फिर अपने अपने पक्षवाले एसा कहेंगे, हमारा पक्ष तेज है, इसमे कोइ नतीजा-नही निकलेगा, उपरलिखे मुजब दोनोंपक्षके संघकी सलाहसे सभा होवे-और संघका आमंत्रण आवे-तो-में-अधिकमासके बारेमे शास्त्रार्थके लिये आनेको तयार-हूं, कोइ एक जैनमुनि कोइ श्रावक शास्त्रार्थके लिये आमंत्रण करे-तो-यह बात मंजूर नहीं हो सकती, संघका काम संघकी सलाहसे होना चाहिये... ३ आगे खरतरगछके मुनि श्रीयुत मणिसागरजी अपने . विज्ञापन नंबर तीसरेमें पुस्तकोंके बारेमें लिखते हैं-मेरेको इधरके जैनी पाटन-भावनगर-खंबायत-बडोदा-सुरत वगेरा .शहरोंके ज्ञान भंडारके रक्षकलोक पक्षपातसे या अपनी भूल प्रगट हो जानेके भयसे-या. किसी मुनिके मनाइ करनेसे बहुत वार लिखनेपर भी नही भेजते. जवाब-आपकों इधरके जैनी-पुस्तक नही भेजते-तो इसमें कोइ क्या करे ? अपने लिये पुस्तक चाहे वहांसे मंगवालो, जैन पुस्तक बंबइमें भी होवेंगे, पुस्तकोंकी कौन कमी है, और फिर आप लिखते हों-ज्ञानभंडारके रक्षकलोग पक्षपातसे-या अपनी भूल प्रगट हो जानेके भयसे पुस्तक नही भेजते, जवाबमें मालुम हो, विना सभा-या शास्त्रार्थ किये किसकी भूल है, इसकी खातरी कौन करेगा, अपने मन सेही अपनी बात सच समजना और दुसरोंकी भूल कहना ___Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034726
Book TitleAdhik Mas Darpan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShantivijay
PublisherSarupchand Punamchand Nanavati
Publication Year1918
Total Pages38
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy