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________________ ( १६१ ) विजयजी तो अन्ततक आपकी सेवामें रहे, इससे वे सबसे अधिक पुण्यशाली और साधुवाद के भाजन हैं । इतिशम् । | ॐ शांतिः शांतिः शांतिः वाड - पंजाबादि देशों में विचरते रहे, ज्ञान संपादन के साथ २ विविध प्रकार की तपश्चर्या भी करते रहे । श्री गुरुदेव के स्वर्गवास होनेके 17 पश्चात् आप अपने धर्मपितामह दादागुरु पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय स्वनामधन्य अज्ञानतिमिरतरणि कलिकालकल्पतरु आचार्य महाराज श्री १००८ श्रीमद्विजयवल्लभसूरिजी महाराज की पवित्र सेवामें रहकर आत्मसाधन करते रहे । ८८ आपने श्रीसिद्धाचलजी, अंतरीक्षजी, केशरियानाथजी, आबूजी आदि अनेक तीर्थों की यात्रा की । - ता० २० अहमदाबाद में मुनिसंमेलन होना निश्चित हो चुका था इसलिए आप परम गुरुदेवके साथ अहमदाबाद पधारे। यहां चैत्र शुदि पंचमी - मार्च १९३४ मंगलवार के दिन से आपका शरीर अधिक नरम होने लगा । श्री संघने बहुत उपचार कराये, परंतु असाता वेदनीय के उदय से रोग शांत होनेके बदले वृद्धिगत होता रहा, सब उपचार निष्फल हुए । असह्य बीमारी के' होनेपर भी आप उसको शांतिपूर्वक सहन करते हुए भगवन्नाम स्मरण करते रहे। अंतमें आप अपनी नश्वर देहको त्याग कर स्वर्गलोक में पधार गये । आपकी स्मशान यात्रा धूमधामसें निकाली गई । इसमें नगरशेठ कस्तुरभाइ मणिभाइ तथा विमलभाइ मयाभाइ आदि मुख्य सद्गृहस्थ संमिलित हुए थे । आपके स्मरणार्थ रतनपोल - उजमबाइ की धर्मशाला के सामने भगवान् श्री महावीरस्वामीजी के भव्यमंदिर में अठाइमहोत्सवादि धार्मिक कार्य हुए। ११ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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