SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 49
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३१ बुद्धि विमलने अंबिका माताका आराधन करना आरंभकिया अंबिका साक्षात् सामने आई । विमलराजने पंचाङ्ग प्रणाम किया । देवीने कहा मैं तुमपर तुष्टमान हुं यथोचित वर मांगो । विमलदेवने कहा- माता ! यदि तुम तुष्ट हो तो मुझे जिनचैत्यके बनाने उचित सहायता दो । और पुत्रकी भिक्षा दो देवी ने कहा तुमारा इतना पुण्य नही कि - तुमको इच्छित दोनो वस्तुएं मिले । एक वस्तु मांगो । मंत्रीने अपनी धर्मपत्निकी अनुमति पूछी तो उसने खुशीसे यह ही सलाह दी कि - जिनमंदिरही कराओ । अंबिका मातासे जगहकी याचना की तो — देवीने कहा बकुल और चंपककी छाया जिस जगह पडती हो वहां की भूमि खोदनेसे बावन ५२ लाख सोनैये निकलेंगे । विमलने उस स्थानको खुदवाया । ठीक उतना ही धन तो निकला परंतु ब्राह्मणोने बडी जिद पकडी । उनका कहना यह था कि, आजतक यह तीर्थ जैनोंके हाथमे नही है, इसलिये हम नई रसम शुरु नही करने देंगे । राजाने अंबिका माताकों पूछा । अंबिकाने कहा इस तीर्थ पर चिरकालसे जिन बिम्बोका अस्तित्व है । प्रातःकाल कुंकुमके साथियेवाली जमीनको खोदना वहांसे श्रीऋषभदेव स्वामी की प्रतिमा निकलेगी । वैसाही हुआ । परंतु फिभी उन्होने अपना कदाग्रह न छोडा । अब उन्होने यह दुच्चर आगे की कि, मानलिया यह तीर्थ जैनोंकाभी है परंतु इस जमीनपर तो हमारी मालिकी है । हम मुंह मांगा दाम Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034722
Book TitleAbu Jain Mandiro ke Nirmata
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1922
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy