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________________ जीव-विज्ञान पारिणामिक और मिश्र ये तीन भाव तो प्रत्येक संसारी प्राणी में होते ही हैं। इन तीन भावों के साथ प्रत्येक प्राणी जीवित है और जीवित रहता है। संसार का कोई भी प्राणी हो उस प्राणी में तीन भाव तो रहेंगे ही, कोई भी जीव इन भावों से रहित नहीं होता है। यहाँ तक कि एकेन्द्रिय निगोद के जीव में भी ये भाव पाए जाएंगे। अब ये भाव कैसे होते हैं? कौन-कौन से होते हैं?इसके बारे में आचार्य स्वयं बता रहे हैं। उससे पूर्व इन भावों की परिभाषा हमें समझ लेनी चाहिए। शंका -औपशमिक भाव क्यों उत्पन्न होता है? समाधान-जब आत्मा में कर्मों का उपशमन होता है तो उससे आत्मा में जो भाव उत्पन्न होता है उसे औपशमिक भाव कहते हैं। कर्मों के उपशमन से आत्मा में औपशमिक भाव उत्पन्न होते हैं। औपशमिक का अर्थ- कर्मों का आत्मा में उपशम हो जाना, उपशमन का अर्थ है-दब जाना। कर्म उदय में है तो वह कहलाएगा औदयिक भाव और उन कर्मों को अगर हमने किसी कारण से दबा दिया तो वह कहलाएगा औपशमिक भाव। एक उदाहरण के माध्यम से हम इसे समझ सकते हैं- एक बर्तन है उसमें गंदा पानी भरा हुआ है। आपने उसमें फिटकरी डाल दी तो उस बर्तन की जो गंदगी थी वह तल में बैठ जाएगी और अब जो साफ पानी है वह ऊपर दिखाई देगा। यह हो गया औपशमिक भाव यानि कि आत्मा में भी जब ऐसे कर्म दब जाते हैं और आत्मा के परिणामों में निर्मलता आ जाती है तो इसे औपशमिक भाव कहेंगे। उस स्वच्छ जल की तरह जब हमारे भाव भी स्वच्छ और निर्मल हो जाएंगे तो इसे औपशमिक-भाव कहेंगे। अब उसी पानी को बहुत सावधानी के साथ किसी दूसरे बर्तन में छान लें जिससे कि उसकी जो मिट्टी है वह सर्वथा अलग हो जाए और वह स्वच्छ पानी दूसरे बर्तन में आ जाए तो वह स्वच्छ पानी हो गया क्षायिक-भाव । अब हम उस पानी को कितना भी हिलाएँ-डुलाएँ उसमें कोई भी गंदापन नहीं आएगा। इसी तरह से जब आत्मा में क्षायिक-भाव उत्पन्न होता है तो अनन्तकाल तक उसी प्रकार का भाव बना रहता है। जितने भी केवलज्ञानादिक हैं वह सब क्षायिक भाव ही हैं। उस पहले वाले बर्तन को हमने थोड़ा सा हिला दिया तो हल्का-सा हिलने के कारण उस बर्तन के पानी में थोड़ा सा गंदलापन आ जाता है। मिट्टी बैठी भी है लेकिन उस पानी में थोड़ा सा गंदलापन आ गया। कहने का तात्पर्य है उस पानी में थोड़ा सा गंदलापन भी है और थोड़ा सी स्वच्छता भी है। इसको ही मिश्रभाव कहते हैं। ऐसे ही आत्मा में क्षायोपशमिक भाव होते हैं। कुछ गुण आत्मा में प्रकट हो जाते है और कुछ गुण आत्मा में दब जाते हैं, इसे मिश्रभाव कहते हैं। जैसे-आपके अंदर, मतिज्ञान और श्रुतज्ञान है, तो वह मतिज्ञान आपका कैसा है? कुछ बातें तो समझ आती हैं और कुछ बातें ऊपर से चली जाती है अर्थात समझ में नहीं आती। 1.औपशमिक-भाव- कर्मों के उपशम से जो भाव उत्पन्न होगा वह औपशमिक भाव कहलाएगा। 2.क्षायिक-भाव - कर्म के क्षय से जो भाव उत्पन्न होगा वह क्षायिक भाव कहलाएगा। 8
SR No.034717
Book TitleJeev Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPranamyasagar
PublisherAkalankdev Vidya Sodhalay Samiti
Publication Year
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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